आखिर कौन है खुशी का परम श्रोत

वर्तमान समय में प्रत्येक व्यक्ति शांति और खुशी की तलाश में है। बहुत सारे लोग अलग-अलग तरीकों से अपनी खुशियों की पाने की कोशिश करते हैं।जिसमें ज्यादातर लोग दौलत और भौतिक चीजों में खुशियां ढूंढते रहते हैं।

तो कुछ लोग नाम और शोहरत में इसे पाने की चेष्टा करते हैं। तो ही संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी खुशियों को सांसारिक रिश्तो में तलाशते हैं।

कई लोग खुशी को पाने के लिए मनोरंजन का सहारा लेते हैं। तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो नशीले पदार्थों में अपनी खुशियों को ढूंढते हैं। यदि देखा जाए तो अपनी खुशी को पाने के लिए हर एक व्यक्ति अपने अपने तरीके से कई सारी चीजों को अपनाता है।

अधिकांश लोग खुशी का स्रोत अपनी इच्छाओं को पूरी करने मैं समझते हैं। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हमारी इच्छा कार या घर खरीदने की हो सकती है। हमारी इच्छा इतिहास या विज्ञान पढ़ने की भी हो सकती है।

हमारी कोशिश यही होती है कि हम अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकें। जिंदगी भर हम एक के बाद दूसरी इच्छा की पूर्ति में लगे रहते हैं।

लेकिन इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती हैं जैसे ही एक इच्छा पूरी होती है वैसे ही हमारे मन में दूसरी इच्छा पैदा होती है। एक के बाद एक इच्छाओं कार्यक्रम आजीवन चलता रहता है। किंतु हम इसे नहीं समझ पाते हैं।

बाजार वादी संस्कृति हमारी इन इच्छाओं का फायदा उठाते हैं वह हमारे अंदर नए-नए इच्छाओं को जन्म देती हैं विज्ञापन करता हमें बताते हैं कि हमारे पास अमुक इलेक्ट्रॉनिक सामान होना चाहिए अमुक तरह के कपड़े होना चाहिए गाड़ी होना चाहिए।

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आखिर कौन है खुशी का परम श्रोत

हमारे अंदर यह भावना जगाने का प्रयास करते हैं कि हम इन सभी चीजों को खरीद लें। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यदि हम इन सभी चीजों को खरीद भी लेते हैं तो कितने समय के लिए हमें खुशी प्राप्त होगी केवल कुछ समय के लिए ऐसा होगा। ऐसा मेरा मानना है। क्योंकि खुशी का यह श्रोत अस्थाई है न कि स्थाई। जो भी चीज अस्थाई होती है वह केवल कुछ समय के लिए होती है।

जीवन के किसी न किसी मोड़ पर हमें यह एहसास होता है कि बाहरी खुशी जिसे हम इस संसार के वस्तुओं में खोज रहे हैं वह मात्र एक भ्रम है इससे ज्यादा और कुछ नहीं। संसार की प्रत्येक वस्तु नाशवान है हम स्वयं भी मृत्यु के के पश्चात इन सभी वस्तुओं को यहीं पर छोड़ कर के चले जाएंगे। अतः अपनी इच्छा पर नियंत्रण रखना परम आवश्यक है।

हमें पहले तो यह सोचना चाहिए कि हम क्या पाना चाहते हैं? और जो भी हम पाना चाहते हैं वह क्या अस्थाई होगा?
तो उसे पाने का क्या तरीका हो सकता है। अस्थाई खुशी तो परमात्मा के पाने से ही आ सकती।

खुशी बाहर नहीं भीतर ही है अगर हम उसे बाहरी दुनिया में ढूंढते हैं तो वह हमें कभी नहीं मिलेगी खुशी का केवल एक ही स्रोत है जो अस्थाई है वह है परमात्मा। यदि हम अपने सच्चे आत्मिक स्वरूप के प्रति सतर्क और जागरूक हो जाएं, तोहमें इतना अधिक प्रेम और खुशी मिलेगी जो हमें किसी भी सांसारिक इच्छा की पूर्ति से प्राप्त नहीं हो सकती है।

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